नई दिल्ली
भारतीय टेलीकॉम सेक्टर में इस वक्त एक जंग चल रही है. ये जंग 6GHz बैंड्स को लेकर है. जहां भारतीय टेलीकॉम ऑपरेटर्स और दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां 6-गीगाहर्ट्ज बैंड्स को लेकर एक दूसरे के खिलाफ खड़ी हैं. दोनों ही पक्ष सरकार से अलग-अलग तरीके से इन्हें जारी करने की मांग कर रहे हैं.
फैसला चाहे जो हो, इसका असर हमारे मोबाइल नेटवर्क और Wi-Fi स्पीड पर पड़ने वाला है. 6GHz बैंड्स का लाइसेंस कैसे जारी होगा इसी बात को लेकर तमाम कंपनियां आमने सामने हैं. इस वक्त दुनिया भर में 6GHz बैंड्स की चर्चा है. इंटरनेट और टेलीकॉम की दुनिया में 6GHz इस वक्त किसी रियल एस्टेट की तरह है.
दुनिया के कुछ देशों ने इसे अनलाइसेंस Wi-Fi के लिए ओपन कर दिया है, तो कुछ ने इसे फ्यूचर मोबाइल यूज के लिए रिजर्व रखा है. वहीं कुछ देश ऐसे भी हैं, जिन्होंने 6G बैंड्स पर कोई फैसला नहीं लिया है. इन देशों की लिस्ट में भारत भी है.
6GHz स्पेक्ट्रम बना नया जंग का मैदान
Apple, Amazon, Meta, Cisco और Intel जैसी कंपनियां चाहती हैं को भारत 6GHz वाले 1200 MHz बैंड को अनलाइसेंस रखे और इसे Wi-Fi यूज के लिए अलाउ करे. उनका कहना है कि ये बैंड घर और ऑफिस में नेटवर्क की भीड़ को कम कर सकता है. खासकर Wi-Fi 7 डिवाइसेस की एंट्री के बाद.
उनका कहना है कि भारत को ग्लोबल पैटर्न को फॉलो करना चाहिए. वहीं Jio और Vi का मानना है कि भारत को 6GHz को IMT स्पेक्ट्रम के तहत मोबाइल नेटवर्क्स के लिए जारी करना चाहिए. दोनों ही ऑपरेटर्स का कहना है कि ये बैंड 5G और फ्यूचर 6G रोलआउट के लिए बहुत जरूरी है.
कैसे होगा यूजर्स का फायदा?
खासकर उन शहरों में जहां खपत ज्यादा है. टेलीकॉम कंपनियों की चिंता जायज है. बिना मिड-बैंड स्पेक्ट्रम के भारतीय नेटवर्क्स पर फ्यूचर में वीडियो स्ट्रीमिंग, गेमिंग और फिक्स्ड वायरलेस एक्सेस के बढ़ने से दबाव पड़ेगा.
वहीं भारती एयरटेल ने फिलहाल बीच का रास्ता चुना है. कंपनी का कहना है कि भारत को स्पेक्ट्रम जारी करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. हालांकि, फैसला किसी भी पक्ष का हो, आम यूजर्स के रोजमर्रा के काम पर इसका असर जरूर पड़ेगा.
ये बैंड Wi-Fi के लिए जारी होता है, तो घर और ऑफिस में नेटवर्क वाइड होगा, उन पर दबाव कम होगा और परफॉर्मेंस बेहतर होगी. खासकर उन जगहों पर जहां मल्टी डिवाइस का इस्तेमाल होता है.
वहीं मोबाइल नेटवर्क्स के लिए अगर ये बैंड जारी होता है, तो 5G और 6G का बड़ा बूस्ट मिलेगा. मोबाइल इंटरनेट की स्पीड बेहतर होगी. अगर भारत इस मामले में कोई फैसला नहीं लेता है और मामले को फ्यूचर के लिए टालता है, तो लोगों को इसका फायदा मिलने में देरी होगी.

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