शासकीय अधिकारियों की हठधर्मिता
माननीय उच्चतम न्यायालय का भी आदेश नहीं मान रहे अधिकारी।
मप्र सरकार में ऐसे अधिकारियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है जो माननीय न्यायालयों के आदेशों के प्रति टाल-मटोल का रवैया अपना रहे हैं। और ऐसी फायलो पर बजाय आदेश क्रियान्वयन के एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय घुमाया जाता है। इस तरह के अनेकों प्रकरण इस दफ्तर से उस दफ्तर में घूमते मिल जाएंगे । ऐसा ही एक प्रकरण 2016 में भोपाल से सेवानिवृत्त हुई श्रीमती लाजवर का है। सेवानिवृत्त होंने के पश्चात उनसे अधिक भुगतान वसूली की गई। न्याय दृष्टांतों के विपरीत होंने से माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर की प्रिंसीपल बैंच ने वसूली आदेश निरस्त कर वसूली गई राशि 8 प्रतिशत व्याज सहित याचिकाकर्ता को भुगतान करने के आदेश पारित किए। किन्तु प्रशासन द्वारा आदेश का पालन न कर माननीय उच्चतम न्यायालय में अपील दाखिल की गई। यह अपील माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिनांक 12-2-2026 को निरस्त करते हुए प्रिंसीपल बैंच जबलपुर का आदेश पालन करने का आदेश दिया गया। किंतु तीन माह व्यतीत होने के बाद भी आवेदिका को भुगतान नहीं किया गया है। शासन को इस मुद्दे पर गहराई से विचार करना चाहिए कि माननीय न्यायालय द्वारा निर्णीत प्रकरणों में इस प्रकार की लापरवाही और उदासीनता के पीछे की मंशा क्या हो सकती है? यह गंभीर प्रश्न है।
SLP(c)no. 030907/2025

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