प्रयागराज
मोतीलाल नेहरू राजकीय मेडिकल कॉलेज से संबद्ध मंडलीय चिकित्सालय ‘स्वरूप रानी नेहरू’ (SRN अस्पताल) का नाम बदलकर ‘अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह’ के नाम पर रखने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरना 14 अगस्त को 10वें दिन भी जारी रहा। यह धरना महुआ डाबर संग्रहालय परिवार के नेतृत्व में चल रहा है।
10वें दिन धरने को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि जिस स्थान पर कभी मलाका जेल हुआ करती थी, वहीं आज SRN अस्पताल स्थित है। इसी मलाका जेल में काकोरी केस के अमर क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह ने 19 दिसंबर 1927 को देश की आजादी के लिए फांसी का फंदा चूमा था। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि जिस भूमि पर क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, उस स्थान को उनके नाम से पहचान मिलनी चाहिए।
बलिदान स्थल को मिले ऐतिहासिक पहचान
महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि ठाकुर रोशन सिंह करीब आठ महीने तक मलाका जेल में फांसीघर के पास स्थित काल कोठरी में बंद रहे थे। 19 दिसंबर 1927 की सुबह उन्होंने हंसते हुए फांसी के फंदे को चूमकर देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद इस ऐतिहासिक बलिदान स्थल पर अस्पताल का निर्माण हो गया, लेकिन समय के साथ ठाकुर रोशन सिंह से जुड़ी स्मृतियां धुंधली होती चली गईं। ऐसे में SRN अस्पताल का नाम अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर किया जाना उनके बलिदान के प्रति सच्चा सम्मान होगा।
सरकार से नामकरण की मांग
आंदोलनकारियों ने कहा कि काकोरी ट्रेन एक्शन की शताब्दी के अवसर पर ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान स्थल को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की जरूरत है। उन्होंने प्रदेश सरकार से SRN अस्पताल का नाम ‘अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह चिकित्सालय’ करने की मांग पर तत्काल मुहर लगाने की अपील की। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि अस्पताल का नाम शहीद के नाम पर होने से यहां आने वाले लोगों को भी उनके ऐतिहासिक योगदान और बलिदान के बारे में जानकारी मिलेगी।
19 दिसंबर से शुरू होगा बलिदान का शताब्दी वर्ष
धरने में वक्ताओं ने कहा कि आगामी 19 दिसंबर से ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान का शताब्दी वर्ष शुरू होने जा रहा है। ऐसे समय में उनके बलिदान स्थल को सम्मान और ऐतिहासिक पहचान दिलाना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि पूर्व की सरकारों से जो चूक हुई, उसे अब सुधारा जाना चाहिए और प्रयागराज की इस ऐतिहासिक धरती पर अमर शहीद की स्मृति को स्थायी पहचान मिलनी चाहिए।
धरने के दसवें दिन छात्र, युवा, अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत बड़ी संख्या में नागरिक पहुंचे। इस दौरान डॉ. शाह आलम राना, डॉ. अवनीश सिंह, सौरभ तिवारी, भीष्म सिंह, सोनू चौधरी, आयुष मिश्रा, सुजीत मौर्या, आकाश द्विवेदी और सुनील केसरवानी समेत कई लोगों ने अपने विचार रखे।

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