भोपाल
बिगड़ी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) के इलाज के लिए केंद्र सरकार ने सितंबर 2024 में चार नई दवाओं को मंजूरी दी थी। मध्य प्रदेश में इनका फार्मूला तो मिल गया, लेकिन इस श्रेणी की केवल तीन दवाएं ही यहां उपलब्ध हैं। इसकी वजह से इलाज शुरू करने में देरी हो सकती है। गांधी मेडिकल कालेज (जीएमसी) से संबद्ध क्षेत्रीय श्वसन रोग संस्थान के अधीक्षक रतन कुमार वैश्य बताते हैं कि टीबी का इलाज संभव है, लेकिन इसके लिए दवा का कोर्स पूरा करना पड़ता है।
जब कोई मरीज बीच-बीच में दवाएं छोड़ता रहता है तो टीबी का जीवाणु उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है।
ऐसे में सामान्य उपचार उस मरीज पर बेअसर हो जाता है। उसे ही टीबी रोग का बिगड़ जाना कहा जाता है।
बिगड़ी टीबी के उपचार के लिए इस तरह की विशेष दवाओं की जरूरत होती है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले वर्ष बेडाक्विलाइन, प्रीटोमैनिड, लाइनज़ोलिड, और मोक्सीफ्लोक्सासिन (बीपीएएलएम) नाम की तीन दवाओं के संयोजन की मंजूरी दी थी।
इन दवाओं का कोर्स मरीज की स्थिति के अनुसार छह से नौ महीने तक चल सकता है।
कहा गया था कि ये दवाएं उन मरीजों पर भी असर करेंगी, जिन पर पारंपरिक उपचार प्रभावी नहीं रहा।
लेकिन इन दवाओं में प्रीटोमैनिड दवा मध्य प्रदेश में अभी मौजूद नहीं है, इसका कंटेंट नहीं मिल पाया है।
इसके लिए अभी मरीजों को और इंतजार करना पड़ेगा।
इस बीच राज्य क्षय रोग प्रशिक्षण केंद्र प्रदेश के टीबी विशेषज्ञों को इस दवा के इस्तेमाल के लिए प्रशिक्षित कर रहा है।

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