लखनऊ
एरा यूनिवर्सिटी, अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ बारबाडोस और वेस्ट इंडीज यूनिवर्सिटी के बीच शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गुरुवार को साझेदारी की नयी शुरुआत हुई। तीनों यूनिवर्सिटी के प्रमुखों ने एमओयू साइन किया। एमओयू का मकसद तीनों संस्थाओं के बीच छात्रों, शिक्षकों और विचारों के आदान-प्रदान के साथ-साथ शिक्षण एवं शोध के क्षेत्र में संयुक्त रूप से कार्य करना। इस कार्यक्रम में भारत और कैरेबियाई क्षेत्र के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं तथा स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भाग लिया और स्वास्थ्य सेवाओं तथा स्वास्थ्य व्यवसाय शिक्षा के क्षेत्र में उभरती चुनौतियों और नवाचारों पर विचार-विमर्श किया। एक दिवसीय अकादमिक अदान-प्रदान कार्यक्रम एरा यूनिवर्सिटी में हुआ। इस समझौता ज्ञापन पर प्रो. आर. क्लाइव लैंडिस प्रो वाइस चांसलर एवं प्रिंसिपल, यूनिवर्सिटी ऑफ द वेस्टइंडीज, बारबाडोस, सुश्री अनीता भटट मुख्य कार्यकारी अधिकारी, अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ बारबाडोस तथा प्रो. डॉ. अब्बास अली महदी कुलपति एरा यूनिवर्सिटी ने हस्ताक्षर किए।
यह समझौता तीनों संस्थानों के बीच अकादमिक सहयोग को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए एरा यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. अब्बास अली महदी ने कहा कि वर्तमान दौर में संस्थानों और विशेषज्ञों का एक साथ आकर काम करना बेहद जरूरी है। कोई भी व्यक्ति या संस्थान अकेले सभी लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सकता। सामूहिक प्रयासों के माध्यम से नई संभावनाओं को साकार किया जा सकता है और समाज के व्यापक हित में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि साझेदारी का प्रमुख उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण एवं नैतिक विज्ञान को बढ़ावा देना है। कार्यक्रम के दौरान एरा यूनिवर्सिटी की ओर से अलग-अलग विषयों पर प्रस्तुतियां दी गईं जिनके माध्यम से संस्थान में चल रहे शैक्षणिक, शोध और नवाचार संबंधी कार्यों की जानकारी साझा की गई। एरा यूनिवर्सिटी के न्यूरो विभाग के एचओडी डॉ. आरके गर्ग ने बताया कि भारत में पहले सिंगल लीजन न्यूरोसिस्टीसर्कोसिस मिर्गी का एक प्रमुख कारण था। स्वच्छता और जागरूकता में सुधार के कारण इसके मामलों में कमी आई है। उन्होंने कहा कि इस घाव को कई बार ट्यूबरकुलोमा समझ लिया जाता है जिसके कारण मरीजों को अनावश्यक रूप से लंबे समय तक एंटी टीबी दवाएं लेनी पड़ सकती हैं। एरा यूनिवर्सिटी की प्रो वाइस चांसलर डॉ. फरजाना महदी ने पर्सनलाइज्ड मेडिसिन विभाग की स्थापना का इतिहास बताते हुए कहा कि वर्ष 2010-11 में दुबई में व्यक्तिगत उपचार आधारित प्रयोगशाला एवं क्लिनिक मॉडल पर काम शुरू किया गया था। भारत में इसे लाने के दौरान जागरूकता और सप्लीमेंट्स के आयात से जुड़ी चुनौतियों के कारण परियोजना को रोकना पड़ा। बाद में स्वदेशी न्यूट्रास्युटिकल्स विकसित करने की दिशा में काम किया गया। वर्ष 2019 में विभाग की औपचारिक शुरुआत हुई। उन्होंने कहा कि पर्सनलाइज्ड मेडिसिन का उद्देश्य मरीज की जेनेटिक और मॉलिक्यूलर प्रोफाइल के आधार पर सही समय पर सही मरीज को सही दवा और सही खुराक उपलब्ध कराना है। इसका लक्ष्य बेहतर निदान, उपचार और रोगी परिणाम सुनिश्चित करना है। अतिरिक्त निदेशक रिसर्च एंड डेवलपमेंट जॉ अली खान ने उपचार के क्षेत्र में हो रहे नवाचारों, बीमारियों की शीघ्र पहचान और बेहतर उपचार में तकनीक की भूमिका के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ये नवाचार डॉक्टरों को बेहतर जानकारी और निर्णय लेने में सहायता प्रदान करते हैं जिससे वे मरीज के उपचार के लिए अन्य संभावित विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ द वेस्टइंडीज, बारबाडोस के प्रो. वाइस चांसलर प्रो. आर क्लाइव ने साझा चुनौतियों के समाधान के लिए पश्चिमी-अमेरिकी पर निर्भरता के बजाय विकासशील देशों के बीच आपसी सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।
वहीं, वेस्टइंडीइज यूनिवर्सिटी के मेडिकल साइंस फैकल्टी के डीन डॉ. डेमियन कोहल ने औषधीय पौधों और पारंपरिक ज्ञान की भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि पौधों का औषधीय रूप में उपयोग हजारों वर्षों पुराना है और पारंपरिक चिकित्सा से आधुनिक दवा खोज तक इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मॉर्फिन, पैक्लिटैक्सेल, विनक्रिस्टीन और आर्टिमिसिनिन इसके प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय और कैरिबियाई पारंपरिक ज्ञान में पौधों के उपयोग की समृद्ध परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि भोजन में इस्तेमाल होने वाली अनेक जड़ी-बूटियां और मसाले भी ऐसे जैव सक्रिय यौगिकों से युक्त होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकते हैं। इस सत्र में एरा यूनिवर्सिटी की शोध गतिविधियों पर डॉ. शारिक अहमद पैथोलॉजी विभाग तथा डॉ. शादाब रजा, स्टेम सेल बायोलॉजी एवं रीजेनेरेटिव मेडिसिन ने प्रस्तुती दी। डॉ. शादाब के अनुसार शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम होने पर स्टेम कोशिकाओं में कई ऐसे जैविक बदलाव होते हैं जो उनकी उत्तरजीविता, प्रसार और उपचार क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक हाइपोक्सिक प्रीकंडीशनिंग को स्टेम सेल आधारित उपचारों की प्रभावशीलता बढ़ाने के संभावित तरीके के रूप में अध्ययन कर रहे हैं।
एरा के क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. मुस्तहसिन मलिक ने एंटीमाइक्रोबियल रजिस्टेंस पर अपने विचार रखे। वहीं डॉ. आलोक कुमार सिंह, डिप्टी डीन ऑफ रिसर्च, यूनिवर्सिटी ऑफ द वेस्टइंडीज बारबाडोस ने क्लिनिकल रिसर्च एंड पोस्टग्रेजुएट ट्रेनिंग पर व्याख्यान दिया। पेशेंट सेफ्टी कॉम्पिटेंसीज एंड सिमुलेशन-बेस्ड लर्निंग विषय पर डॉ. सुचेता दांडेकर, बायोकैमिस्ट्री विभाग तथा डॉ. अनुजा भार्गव, विभागाध्यक्ष, ईएनटी विभाग ने अपनी प्रस्तुति दी। कार्यक्रम के अंतिम सत्र ‘शेपिंग द फ्यूचर’ में सुरक्षित चिकित्सक और स्वस्थ जीवन पर विशेष चर्चा की गई। डॉ. जैनब नकवी, बायोटेक्नोलॉजी विभाग एरा यूनिवर्सिटी ने न्यूट्रिशन एंड लॉन्गेविटी विषय पर विचार व्यक्त किए। वहीं डॉ. एंजेला कैरिंग्टन डायल, असिस्टेंट डीन, असेसमेंट एंड एग्जामिनेशंस, अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ बारबाडोस ने लाइफस्टाइल एंड हेल्दी लिविंग के अनुभव साझा किए। इस मौके पर प्रो चांसलर मीसम अली खान, एरा मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. जमाल मसूद, कई विभागों के एचओडी और बड़ी संख्या में मेडिकल छात्र मौजूद रहे।

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