पाकिस्तान की नई रणनीति! दो मुस्लिम देशों के साथ बना नया मोर्चा, ‘इस्लामिक NATO’ पर बढ़ी चर्चा

नई दिल्ली

इस्लामिक नाटो का मंच सजकर तैयार हो गया है। पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन की तर्ज पर अब सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच एक ऐसी ही साझेदारी हो रही है। रिपोर्ट्स की मानें तो तीनों देश शुक्रवार को एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने जा रहे हैं। जेद्दा में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की बैठक के दौरान इस समझौते को अंतिम रूप दिया जा रहा है। भारत इस समझौते पर करीब से नजर रखेगा।

बता दें कि इससे पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ पहले ही संकेत दे चुके थे कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच मौजूदा रक्षा समझौते का दायरा बढ़ाकर इसमें कतर और तुर्की को भी शामिल किया जा सकता है। इसके बाद से ही इस्लामिक नाटो की चर्चाएं तेज हो गई थीं। बीते मई में पाकिस्तानी चैनल हम न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में आसिफ ने कहा था कि इस गठबंधन पर अलग-अलग स्तरों पर बातचीत चल रही है और भविष्य में इसमें कतर और तुर्की भी शामिल हो सकते हैं। गौरतलब है कि पिछले साल पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक बड़ा रक्षा समझौता हुआ था। इसके तहत किसी भी एक देश पर हमले को दोनों पर हमला माना जाएगा। अब इस समझौते में तुर्की भी शामिल हो सकता है।

इस्लामिक नाटो में किसकी क्या भूमिका?
जानकारों की मानें तो इस समूह में तीनों देशों की भूमिका भी तय हो गई है। इस्लामिक नाटो को खड़ा करने में जहां सऊदी अरब वित्तीय सहायता देगा, वहीं पाकिस्तान अपने परमाणु हथियार, बैलिस्टिक मिसाइल और मैनपावर देगा। तुर्की अपनी सैन्य विशेषज्ञता और घरेलू रक्षा उद्योग का योगदान दे सकता है। अंकारा स्थित थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहत अली ओजकान के मुताबिक, "जैसे-जैसे अमेरिका इस क्षेत्र में अपने और इजरायल के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, बदलते समय में ये देश अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान करने के लिए नए तरीके विकसित कर रहे हैं।”

भारत के लिए खतरा?
इस्लामिक नाटो का यह विचार भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से एक संवेदनशील स्थिति पैदा करता है। कंगाली और आर्थिक मंदी झेल रहा पाकिस्तान इस ब्लॉक के जरिए खुद को इस्लामिक दुनिया में एक मजबूत सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश में है। वहीं तुर्की भी कश्मीर मुद्दे पर जहर उगलता रहा है। अब तुर्की और पाकिस्तान की नजदीकी से भारत को खतरा हो सकता है।

वहीं भारत और सऊदी अरब के बीच संबंधों की बात करें तो पिछले कुछ सालों में रिश्ते मजबूत हुए हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान संग सऊदी की साझेदारी के बाद भारत ने संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी अहम रक्षा समझौता किया है। अब भारत के लिए यह देखना अहम होगा कि सऊदी अरब इस समझौते को केवल अपने ईरान-विरोधी एंगल तक सीमित रखता है, या पाकिस्तान इसे भारत-विरोधी एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने में कामयाब होता है।

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